सर्वांना कोजागरी पोर्णिमेच्या शुभेच्छा :-)
चारुचंद्र की चंचल किरणें,
खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है,
अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती,
हरित तृणों की नोकों से,
मानों झूम रहे हैं तरु भी,
मन्द पवन के झोंकों से॥
'शरद ऋतू' आगमनाप्रित्यर्थ मैथिली शरण गुप्तांच्या ह्या ओळी व्हॉट्सप ढकलगाडीतून साभार :-)
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